उसे इंतज़ार था...
उस मोड़ पर आऊंगी मैं !
मैं आई भी, अपनी मुठि्ठयां भींचे
“तुम आ गई,
लाई हो इन हाथों में मेरी 'मांग' ? “
देखो मेरी आँखों में...
इन बंद हथेलियों में,
तुम समझते हो जिसे मांग...
...साहस ! है वो मेरा
हैं कुछ शब्द की प्रतिध्वनियां, कहना है...
...कि मुझे प्रेम नहीं तुमसे !
...हां, स्वीकृति ! तुम हो मेरी,
जिसे अभिव्यक्त करने से पूर्व-उपरांत
अक्कड़-बक्कड़ नहीं बूझने पड़ते ।
सरल, सुखद स्तर हो तुम
धन्यवाद ! तुम्हारे पात्र का,
जिसमें समा जाती हूं मैं, द्रव की तरह ,
मन-मर्जी का वेश लिए...
...बिल्कुल वैसे,
...जैसे...घेराव नहीं,
स्थान मिलने पर मिलता है सुकून ।
और, तुम...
मुझें न पहचानने का अभिनय करते,
आंखों पर पारदर्शी दर्पण डाले...
निःशब्द मुझे एक टक,
संवेदनाओं के समूह लिए...
निरंतर, शब्द के संचार में पिरो रहे हो
हां ! निरंतर, निनाद, नि:शब्द, तुम्हीं हो ।
प्रेम नहीं, सम्पूर्ण अभिव्यक्ति ... तुम्हीं हो ।
तुम्हीं हो...। तुम्हीं हो...। तुम्ही हो...।
"इसके उपरांत भी नहीं मिला निहितार्थ ,
तो बेशक, होंगे ये सब... अधूरे संवाद ।
स्वीकृति नही..., सिर्फ...अधूरा संवाद ।"
Thursday, April 2, 2009
Thursday, February 26, 2009
लिखूं आज मैं कविता...

लिखूं आज मैं कविता...
पर शब्दों का जाल न हो ।
वाक्य बन जाए मेरी वेदना,
शब्दों को अभिमान न हो ।
चाहूं जो कह पाऊं मैं,
विषय-वियोजन वह चुनूं...
सत्य की गरिमा झलके जिसमें,
अर्धसत्य का नाम न हो ।
पन्नों पर उतरे जीवन
दृष्टिपटल आभास हो...
न नया हो कुछ सही,
अभिव्यक्ति निस्श्वास न हो ।
लिखूं आज मैं कविता...
पर शब्दों का जाल न हो !
Thursday, February 12, 2009
' मरासिम'...!
तुम्हारा मुझ पर, विश्वास क्या है ।
समंदर से गहरा, ये पात्र क्या है ।।
ये दिल की ख़लिश,
ये तपिश आंखों की ।
जो सब कुछ है तुझमें,
तो ये प्यास क्या है... ।।
ज़ाहिर है तेरी आंखों में,
होश खोने का डर है ।
इस तरह से हंस-हंसकर,
परखने का अंदाज़ क्या है... ।।
सांसों में तेरी धड़कन,
उम्मीदों की कमी है ।
आहिस्ता-आहिस्ता ही सही,
ये बदला मिज़ाज क्या है... ।।
तेरे साथ चलते-चलते,
छूटे हैं कई शख्स...।
फिर तेरी आंखों में,
सूखी बरसात क्या है... ।।
महसूस हो 'मरासिम',
लाज़मी अहद यही ही।
जो मुझसे है दूरी,
तो ये दुआ सलाम क्या है ।।
तेरी रिन्दों सी हरकत,
एक बचपने के साथ... ।
जो न समझे तुझे 'जूबी',
तो ये बिसात क्या है... ।।
ये अदाज़-ए-गुफ़्तगू,
मेरे लफ़्ज़ों के दरमियान... ।
जो महसूस करे तू,
तो अभी न सही,
कभी तो कह...
तेरे अंदर दबा, ये सैलाब क्या है ।।
समंदर से गहरा, ये पात्र क्या है ।।
ये दिल की ख़लिश,
ये तपिश आंखों की ।
जो सब कुछ है तुझमें,
तो ये प्यास क्या है... ।।
ज़ाहिर है तेरी आंखों में,
होश खोने का डर है ।
इस तरह से हंस-हंसकर,
परखने का अंदाज़ क्या है... ।।
सांसों में तेरी धड़कन,
उम्मीदों की कमी है ।
आहिस्ता-आहिस्ता ही सही,
ये बदला मिज़ाज क्या है... ।।
तेरे साथ चलते-चलते,
छूटे हैं कई शख्स...।
फिर तेरी आंखों में,
सूखी बरसात क्या है... ।।
महसूस हो 'मरासिम',
लाज़मी अहद यही ही।
जो मुझसे है दूरी,
तो ये दुआ सलाम क्या है ।।
तेरी रिन्दों सी हरकत,
एक बचपने के साथ... ।
जो न समझे तुझे 'जूबी',
तो ये बिसात क्या है... ।।
ये अदाज़-ए-गुफ़्तगू,
मेरे लफ़्ज़ों के दरमियान... ।
जो महसूस करे तू,
तो अभी न सही,
कभी तो कह...
तेरे अंदर दबा, ये सैलाब क्या है ।।
Tuesday, February 10, 2009
सम्मोहन या फिर...?
अपनी जंग खाई लेखनी पर आज फिर विचारों से लोहा लेने का मन कर रहा है...ये अजीब आकर्षण है कि उसे न तो मैं मित्रता की श्रेणी में रख सकती हूं ना ही शुभचितकों की ! फिर भी आकर्षण की बात की जाए तो मस्तिष्क पर उसका सम्मोहन कई दिनों से बरक़रार है, और लगातार बढ़ता ही जा रहा है । मैं किन सम्बंधों के चरम पर हूं, ये मुझें नहीं पता ? क्योंकि मेरी जैसी लड़की जो प्रेम को अलग-अलग सकरात्मक फ़ंडो से नकारने में माहिर है,वो इन दिनों प्रेम की परिभाषा, उसकी क्षणिक उपस्थिति से जद्दोजहद कर रही है। ...इस दौरान मैं अक्सर सोच रहीं हूं कि आख़िर आवश्यकता ही क्या है ऐसे शब्दों से उलझने की,जिसके अर्थों से आपके या यूं कहो मेरे जीवन में उफ़ान उपजे ।और इन सबके बीच सुडोकु जैसी जीवन शैली को अपनाएं हुए पत्रकारिता जैसे प्रोफ़ेशनल पथ पर खिलंदड़ हो पाना... कहां तक वाजिब होगा ? अपने जीवन के कथित संघर्षों को भविष्य की रोज बनती-बिगड़ती योजनाओं में सफलतापूर्वक क्रियांवित होते सोचना मानसिक शून्यता ही तो है । ...और इन सब के बीच परिवर्तन की परिधि पर केंद्रित मेरे इस मन में तमाम ऐसी विचारधाराएं हिलोरे मार रही हैं जो बड़ी ही संजीदगीं से परिश्रम और सफलता के आन्तरिक सम्बंधों को समझना चाहती है...। शेष अगले अंक में या फिर...
Monday, February 9, 2009
स्वीकृति...!
कितनी आसानी से कह दिया, तुम्हें प्यार है !
क्या तुमने बिल्कुल नहीं सोचा,
इस बेबाक़ लफ़्ज़ आदाएगी में,
कितने ऐसे दरमियान है...
जो मुस्कुरा रहें हैं ये सोच-सोचकर...
...कि देखो, देखो...
नहीं मालूम इन्हें कि,
आधुनिक युग में प्रेम की परिभाषा...!
शायद मालूम है हमें इतना कि...
दो दिलों का मिलना ही पर्याप्त है...!
दोस्त से प्रेम फिर प्रेम करना...
उसको भी गैर-ज़िम्मेंदाराना लगा,
जिसे बताया मैंने तुमसे भी पहले कि...
तुम्हीं हो वो स्वीकृति, जिसे महसूस करने लगी हूं मैं...
मुझें पता है कि...
...हर वाक्य का अर्थ अभिभार नहीं होता,
जिसे उठाती रहूं मैं हर बार...!
हां, मुझें रहना है इस समाज में, उन बंधनों के साथ...!
...जो मुझें हैं तुम जैसे अजीज़ !
...और जिसे ठुकराने का पाप,
मेरी स्वीकृति नहीं देती ।
उन बंधनो को ही जी कर,
यह कह सकीं हूं आज...
...कि तुम्हीं हो वो स्वीकृति,
जिसे महसूस कर रही हू मैं...स्वयं से भी पहले !
क्या तुमने बिल्कुल नहीं सोचा,
इस बेबाक़ लफ़्ज़ आदाएगी में,
कितने ऐसे दरमियान है...
जो मुस्कुरा रहें हैं ये सोच-सोचकर...
...कि देखो, देखो...
नहीं मालूम इन्हें कि,
आधुनिक युग में प्रेम की परिभाषा...!
शायद मालूम है हमें इतना कि...
दो दिलों का मिलना ही पर्याप्त है...!
दोस्त से प्रेम फिर प्रेम करना...
उसको भी गैर-ज़िम्मेंदाराना लगा,
जिसे बताया मैंने तुमसे भी पहले कि...
तुम्हीं हो वो स्वीकृति, जिसे महसूस करने लगी हूं मैं...
मुझें पता है कि...
...हर वाक्य का अर्थ अभिभार नहीं होता,
जिसे उठाती रहूं मैं हर बार...!
हां, मुझें रहना है इस समाज में, उन बंधनों के साथ...!
...जो मुझें हैं तुम जैसे अजीज़ !
...और जिसे ठुकराने का पाप,
मेरी स्वीकृति नहीं देती ।
उन बंधनो को ही जी कर,
यह कह सकीं हूं आज...
...कि तुम्हीं हो वो स्वीकृति,
जिसे महसूस कर रही हू मैं...स्वयं से भी पहले !
Thursday, February 5, 2009
संवेदना... मैं, मेरे जीवन की गाथा !
कहीं मिला एक कोना मुझसे
कहने लगा, सुखी हो तुम...?
बातें उसकी चुभी शूल सी...
वह मुझें, मैं उसे निहारुं...
प्रश्न का अपने उत्तर चाहूं...
मानव रुपी जिज्ञासा, चंचलता का मन लिए
क्या खोया, क्या पाया...
जब उसको बतलाया...
ठहरे जल सा देखे मुझको...
सागर का उफ़ान लिए...
मन, मस्तिष्क का द्वंद्ध उतारे...
कह पाया दो शब्द यही...
...मैं मेरे जीवन की गाथा, नहीं सरल जीवन सा ये !
कहने लगा, सुखी हो तुम...?
बातें उसकी चुभी शूल सी...
वह मुझें, मैं उसे निहारुं...
प्रश्न का अपने उत्तर चाहूं...
मानव रुपी जिज्ञासा, चंचलता का मन लिए
क्या खोया, क्या पाया...
जब उसको बतलाया...
ठहरे जल सा देखे मुझको...
सागर का उफ़ान लिए...
मन, मस्तिष्क का द्वंद्ध उतारे...
कह पाया दो शब्द यही...
...मैं मेरे जीवन की गाथा, नहीं सरल जीवन सा ये !
Saturday, October 11, 2008
रुदन बनने का श्रेय..............!
बार- बार बिछुड़ने पर
समझाता हूं स्वयं को एक वाक्य से.....
रुदन बनने का श्रेय, मिला तेरे विश्वास से
माना कि, पीड़ा का परिचायक हूँ
पर साथी भी तो हूँ तेरा
कारण अकारण आ जाना
क्या सम्बन्ध साक्ष्य नहीं मेरा
निनाद हूँ टूटे भावों का
क्षोभ नहीं मैं साक्ष्य हूँ
अतीत की अकुलाहट
बीता ! वर्तमान हूँ
विडम्बना है जीवन की
मेरी मृत्यु ही मेरा जीवन है
कि चक्षु पे गिरते ही
हस्तों से तू उठाता है
यें असीम प्रेम ही तो है मेरा
तेरी हर पीड़ा अपनाता हूँ
जब भी रहोगे शोक में
सर्वप्रथम मैं आता हूँ
बार-बार बिछुड़ने पर
स्वयं को मैं समझाता हूँ ........
समझाता हूं स्वयं को एक वाक्य से.....
रुदन बनने का श्रेय, मिला तेरे विश्वास से
माना कि, पीड़ा का परिचायक हूँ
पर साथी भी तो हूँ तेरा
कारण अकारण आ जाना
क्या सम्बन्ध साक्ष्य नहीं मेरा
निनाद हूँ टूटे भावों का
क्षोभ नहीं मैं साक्ष्य हूँ
अतीत की अकुलाहट
बीता ! वर्तमान हूँ
विडम्बना है जीवन की
मेरी मृत्यु ही मेरा जीवन है
कि चक्षु पे गिरते ही
हस्तों से तू उठाता है
यें असीम प्रेम ही तो है मेरा
तेरी हर पीड़ा अपनाता हूँ
जब भी रहोगे शोक में
सर्वप्रथम मैं आता हूँ
बार-बार बिछुड़ने पर
स्वयं को मैं समझाता हूँ ........
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